बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

प्रहरी

Mere Desh Ka Prahri
मेरे देश का प्रहरी,
क्यों खामोश हो गया।
किसने तुम्हें सुस्त प्रसुप्त किया,
किसने की पहरेदारी,
तुम्हारी धारदार लेखनी पर,
तुम्हारे जांबाज बोलों पर,
किसने मुंह बंद किया।
क्यों सुनाई नहीं देती,
सत्य की आबाज।
झूठ से दफ़न कर दी गयी,
हंसती खिलखिलाती जगती जगाती,
आबाज लगाती गुनगुनाती आबाज।
या फिर तुम्हारे स्वर बोलों पर,
किसीने कब्ज़ा कर लिया।
क्या तुम्हे विश्वास में लेकर,
तुम्हारे विचारों का हरण कर लिया।
कुछ ज्ञात है तो कुछ अज्ञात है ,
इसलिए चुप हो 
वरना किसी की क्या बिसात है।
भयग्रस्त स्वयं करते हैं लोग,
झुटे दम्भ और चालाकी से भरे।
सरलता को मार देते हैं वो
जब उठती है चीख
तो कहते डरते हैं लोग,
                                 इसमें तो अग्नि का वास है। 
                                                                   Pratibha Katiyar
 


मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

राजनीतिk छितिज

आश्चर्य होता है उस मानसिकता पर जब सत्ता में दखलंदाजी करने वाले लोग विवेक के वजाय तुस्टीकरण और पोषण की नीति के मार्ग पर चल पड़ते हैं. सत्ता से दूर रहने वाले सत्ताधीश बना दिए जाते हैं और सत्ता से दूर होने का दिखावा करने वाले सत्ता के पिछलग्गू बन जाते हैं. सत्ता को हथियाने वाले सत्ताधीन बना दिए जाते हैं1 क्या भारतीय राजनीति में इन समीकरणों से हटके किसी और व्यापक छितिज को विस्तार देने का फार्मूला बन पायेगा. या ऐसे  किसी  एक और उटोपिया की तलाश में पुनः एक नयी विचारधारा का प्रवाह शुरू हो जाएगा। खैर नवीन  विचारधाराएँ फलें फूलें विकास करें पर किसी आश्रय के  तले नहीं वरन अपना मार्ग स्वयं तलाशें। 
                                 Pratibha Katiyar

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

naitikta khoti patrakarita

ऐसे में जबकि पूरा देश इस चुनाव प्रक्रिया और नतीजों में दिलचस्पी लेता दिखाई दे रहा है तो वहीँ एक वर्ग ऐसा भी है जो देश के भावी नागरिकों के भविष्य को लेकर चिंतित है और मीडिया के अत्यधिक दोहन मंथन से अपने बच्चों का ध्यान पढ़ाई लिखाई से विमुख कर दिए जाने से उन्हें ज्यादा देर टीवी देखने से नियंत्रित कर रहा है ! मुझे याद है एक बार राष्ट्रपति के रूप में मौजूद डॉ ए . पी. जे. अब्दुल कलाम से किसी ने प्रश्न पूछा कि हमारे माता पिता तथा अध्यापक हमें टी वी एवं सिनेमा देखने से मना करते हैं1 आपके विचार से क्या मीडिया हमारे लिए नुकसान दायक है? तो  उसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा यह सब व्यक्ति के अपने मिशन पर निर्भर है यदि आप अपनी पढ़ाई में उत्कृष्टता अर्जित करने में लगे हों तो मुझे नहीं लगता की आपके पास टीवी देखने का समय होगा ! एकाग्रचित छात्र को को शायद इस प्रकार के आकर्षण विचलित नहीं करते! किन्तु प्रश्न में मिडिया के प्रति नकारात्मक भाव उपस्थित होने से एक मीडिया कर्मी होने के नाते यह विषय चिंतन का  अवश्य दिखाई देता है  क्यों मीडिया अत्यधिक लोकप्रियता पाने के चक्कर में अपना सम्मान दिन पर दिन खोती जा रही क्या मीडिया अपने इस नैतिक गिरावट पर आत्मचिंतन करने को तैयार है कहीं ग्लैमर की चकाचौंध में उसके  विवेक के हथियार किसी छलावे के आगे  समर्पण की भेंट तो नहीं चढ़ गये!  

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

rajnitik dangal

इन दिनों देश की राजधानी दिल्ली में विधान सभा चुनाव्  को लेकर मीडिया द्वारा जिस तरह कवरेज की जा रही है उसे देखकर लगता है पूरा  देश सिमटकर दिल्ली केंद्रित हो गया, दोनों ही  ईमानदार व् स्वच्छ छवि वाले बड़े प्रतिद्वंदिओं के खड़े हो जाने से भ्रस्टाचार मुक्त भारत की पक्षधर जनता कहीं न कहीं असमंजस में भी है किसे वोट दे. जनता को तात्कालिक और लम्बे समय दोनों के लिए निर्णय लेने में जिस तरह दोनों पार्टियां अपील कर रही हैं और मिडिया जिस तरह आमजनमानस से लेकर प्रबुद्ध वर्ग तक को  सामाजिक आर्थिक मनोवैज्ञानिक व् तमाम तरह के विश्लेषण से युक्त मंच प्रदान कर रही है ऐसे में ये चुनाव पुराने ज़माने के किसी क्रिकेट मैच की लोकप्रियता से कम नहीं लग रहे . 
मजे की बात है कि सभी पार्टियां विकास के नाम पर वोट मांगती हैं ऐसे में जनता को तय करना होगा की असली विकास किसमें निहित है मात्र मुद्दों पर बहस करने के अतरिक्त विकास को  राष्ट्र हित से अवश्य जोड़ा जाना चाहिए1