शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

गंगोत्री - गोमुख की रोमांचक यात्रा और हिमालय दर्शन

हिमालय की गोद में बसी, चारों ओर से  वनाच्छादित, पर्वतों से घिरी गंगा के वेग से कल-कल करती गुंजायमान संगीत  की भूमि और बर्फ की सफेद चादरों से लिपटी ऊंचे ऊंचे पर्वतों की चोटी के सुंदर दृश्यों से सराबोर कर देने वाली गंगोत्री किसी भी प्रकृति प्रेमी, अध्यात्म प्रेमी और पर्वतारोहण के शौकीन व्यक्ति को अपनी ओर खींच लेती हैl उत्तराखंड के चार धामों में से एक गंगोत्री, जिला उत्तरकाशी से 95 किलोमीटर दूर है यहीं से 18 किलोमीटर दूर पैदल रास्ता है मां गंगा का उद्गम स्थल गोमुख ग्लेशियर l गंगोत्री में एक और गोमुख से भागीरथी तो दूसरी ओर 17 किलोमीटर दूर केदारताल से केदार गंगा आकर मिलती हैं l इसी पावन धाम गंगोत्री और गोमुख ग्लेशियर जाने का अवसर सौभाग्य से मुझे मिला अक्टूबर के मध्य मेंl

            हमारी  यात्रा की शुरुआत 17 अक्टूबर 2007 को l वर्ष अधिक मायने नहीं रखता किन्तु अक्टूबर का अंतिम पक्ष जोकि हिमालय की यात्रा के लिए काफी ठंडा माना जाता है हालांकि यह वहां के लिए सिर्फ एक शुरुआत है लेकिन हम साधारण मानवों के लिए हड्डी गला देने वाली ठंड होती है, क्योंकि इसके बाद दीपावली के आसपास बर्फ जमने और रास्ता खराब होने के कारण प्रत्येक वर्ष गंगोत्री का मार्ग बंद कर दिया जाता  हैl इस यात्रा में मैं और मेरी बड़ी दीदी के साथ हमारे गाईड थे पूरा भारत भ्रमण कर चुके जीजाजी जिनके माध्यम से हमें स्वप्न में बसे हुए हिमालय के दिव्य दर्शन को साकार करने का अवसर मिल रहा था l

         सबसे पहले हमने उत्तरकाशी में पहुंचकर थोड़ा बहुत भ्रमण और रात्रि विश्राम किया l गंगा किनारे बसे इस शहर में रात भर गंगा की कलकल करती आवाज सुनी जा सकती है बाबा विश्वनाथ की उत्तर की काशी दो पर्वतों के बीच बसी हुई है जिसके एक और वरुणावत पर्वत है जहां प्रायः भूस्खलन होता रहता है जिसके कारण इस शहर का अस्तित्व खतरे में पड़ा है लेकिन प्रयास द्वारा इस पर्वत को बचाया जाता रहा है दूसरी ओर के पर्वत पर स्थित है नेहरू पर्वतारोहण संस्थान जो लगभग 6 किलोमीटर की ऊंचाई पर है यहां पर पर्वतारोहण का प्रशिक्षण दिया जाता हैl जीजाजी ने पर्वतारोहण का बेसिक और एडवांस कोर्स यहाँ से किया था तो वो अपनी यादें ताजा करने और हमें अपनी आगे की यात्रा के लिए मजबूत करने और सबसे बड़ी बात अगले दिन गंगोत्री के लिए 2:00 बजे की बस होने के कारण, हमने यहाँ तक की ट्रैकिंग की और बचे हुए समय का सदुपयोग इसे देखने में बितायाl यहां स्थित संग्रहालय में पर्वतारोहण की बहुत सारी जानकारी जुटाई जा सकती हैl तो  जीजाजी एक बैंक अधिकारी होने के साथ एक पर्वतारोही भी हैं, य़ह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ l

       यहां से वापस आकर हमने गंगोत्री के लिए बस से प्रस्थान किया मार्ग में हरे भरे पहाड़ों के बीच बहती निर्मल गंगा के साथ-साथ हमारी बस आगे बढ़ती जा रही थी मार्ग में अनेक दर्शनीय स्थल हैं जैसे गंगनानी, जहां गर्म पानी का कुंड है यह मान्यता है कि यहां स्नान करने पर चर्म रोग समाप्त हो जाता है इसके आगे हर्सिल है यहां  सेब से लदे हुए बाग और एक साथ दिखने वाले 10 झरने यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य को और भी अद्भुत बना रहे थे l हरसिल के आगे है लंका और भैरव घाटी, इसके साथ ही बर्फ की सफेद चादरों से लिपटी ऊंची ऊंची चोटियां दिख रही थी जो हमें गंगोत्री की समीपता का एहसास दे रही थी l आखिर शाम को 6:30 बजे हम लोग गंगोत्री पहुंचे उस समय तक रात्रि यहाँ अपने पैर पसार चुकी थी और बढ़ती ठंड की चुभन हमारा स्वागत कर रही थीl

       यहां पर ऑक्सीजन की मात्रा भी काफी कम है अधिकांश यात्री आगे गोमुख तक जाने का जोखिम नहीं उठाते और यहीं से दर्शन करके वापस लौट जाते हैं l हमने रात्रि विश्राम के बाद अगले दिन पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार गोमुख जाने का निश्चय किया l गोमुख समुद्र तल से 3892 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और गंगोत्री से 18-19 किलोमीटर दूर है गंगोत्री से गोमुख का मार्ग गंगोत्री नेशनल पार्क के अंतर्गत आता है अतः वहां जाने से पहले प्रवेश द्वार पर एंट्री के रूप में ₹40 प्रति व्यक्ति शुल्क चुकाया l अनुमति सिर्फ गोमुख तक थी उसके आगे तपोवन का मार्ग बंद था l पूरा मार्ग अत्यंत ही रोमांचक और प्राकृतिक सुंदरता से भरा है यह मार्ग वैसे तो पैदल यात्रा का है लेकिन घोड़े खच्चर करके भी यहां तक जा सकते हैं यह घोड़े अधिकतम भोजबासा तक जाते हैं इससे आगे 5 या 6 किलोमीटर गोमुख तक पैदल ही जाना होता है क्योंकि आगे का पूरा रास्ता बोल्डर यानी शिलाखण्डों से निर्मित है l इसका मतलब है चट्टानों और पत्थरों के बीच आपको अपना रास्ता खुद बनाना पड़ता हैl

        हमने गोमुख तक का मार्ग पैदल ही तय करने का निश्चय किया 18-19 किलोमीटर गोमुख और फिर वापस गंगोत्री इस तरह लगभग 40 किलोमीटर तक की पदयात्रा के लिए हमने पर्याप्त अभ्यास किया था क्योंकि इस रास्ते पर चलने के लिए मांसपेशियों को तैयार करना सबसे पहली आवश्यकता थी l हमें जहां भी अवसर मिलता हम पहाड़ों पर ट्रैकिंग करते l गंगोत्री से हम जो पानी गरम करवा के अपने साथ ले गए थे वह 5 मिनट के अंदर ही जीरो डिग्री सेंटीग्रेड का हो गया इतनी ठंड के कारण प्यास भी नहीं लगती थी लेकिन उसकी पूर्ति के लिए हम बीच-बीच में एक घूंट पानी मुंह में रख लेते हैं और चलते रहते थे जब वह अंदर गर्म हो जाता तो हम उसे गटक लेते थे ताकि डिहाइड्रेशन जैसी आम समस्या से बचा जा सके, गाइड की ओर से ऐसा ही निर्देश मिला था l

       9 किलोमीटर दूर 3660 मीटर की ऊंचाई पर आता है चीड़वासा  यहां तक चीड़ के  ऊँचे - ऊँचे  पेड़ हैं  इसके आगे भोजपत्र के पेड़ है यहां आने वाली यात्री इन भोज पत्रों को पेड़ की छाल से उचाड़ते रहते हैं जिसके कारण इन पेड़ों का जीवन खराब हो गया है। भोजबासा तक आते-आते पेड़ों की संख्या घटने लगती है और छोटी-छोटी घास शुरू हो जाती है इसके बाद यह घास भी समाप्त हो जाती है और पूरा मार्ग पथरीला चट्टानों वाला शुरू हो जाता है यहां पहाड़ों पर जमी हुई बर्फ पर चलने में बहुत सावधानी रखनी होती है क्योंकि जब यह पूरी तरह से जम जाती है तो कांच की तरह फिसलन भरी हो जाती है जरा सी भी असावधानी आपको खाई में धकेल सकती है।

      थोड़ी थोड़ी दूर के अंतराल पर बहते नाले को पार करते हुए हम आगे बढ़ते जा रहे थे यह साफ स्वच्छ नाले पहाड़ की चोटियों पर जमी बर्फ के पिघलने से उत्पन्न होते हैं जो पहाड़ों पर झरने  का रूप लेते हुए सीधे भागीरथी में जाकर गिरते हैं इनमें से किसी किसी नाले पर कुछ मजबूत लकड़ियां रखकर पुल बना दिया गया है, तो कुछ नालों को ऐसे ही पत्थरों के सहारे पार करना पड़ता है। पहाड़ों के विभिन्न रूप इस मार्ग में एक साथ देखने को मिल जाते हैं शुरू में जहां यह हरे भरे पेड़ों से आच्छादित हैं तो कहीं पत्थर ही गिरते रहते हैं, कहीं इतने मजबूत चट्टानों वाले पहाड़ हैं जहाँ पेंड तो क्या घास भी उगनी मुश्किल है उसी तरह इन चट्टानों के रंग भी बदलते रहते हैं। पहाड़ों की इतनी विविधता एक साथ अगर किसी को देखनी हो तो इस मार्ग पर जरूर जाना चाहिए l

     गंगोत्री से ही एक चोटी भागीरथी -2 दिखाई देती है, आगे 10 किलोमीटर बाद शिवलिंग चोटी भी सूरज की किरणों से दीप्तिमान दिखाई देती हैl  ऐसे ही मनमोहक रास्तों का आनंद लेते हुए हम लोग चलते जा रहे थे अचानक रास्ते में हमें कुछ हिरण दिखाई दिए यह हिरण जिस जगह थे वह पत्थर गिरने वाले पहाड़ थे, मैं इन हिरणों को देखने में तल्लीन थी और जहां खड़ी थी वह बहुत ही संकरी जगह थी सिर्फ खड़े रहने भर की, तभी वहाँ से हटने के लिए मेरे पीछे आ रही दीदी ने जोर से आवाज देकर कहा, मैं जैसे ही एक कदम आगे बढ़ी, एक पत्थर आकर ठीक उसी स्थान पर गिरा जहां मैं खड़ी थी, वैसे वह पत्थर ज्यादा बड़ा नहीं था लेकिन इतनी वेग से गिरता हुआ पत्थर मेरा सिर फोड़ने के लिए पर्याप्त था, वह मेरा संतुलन भी बिगड़ सकता था, और मैं सीधे खाई से लुढ़कते हुए गंगा की गोद में जा सकती थी l वहां हम लोगों ने बिना रुके तेजी से चलते रहने में ही भलाई समझी क्योंकि अब तक तो पत्थर गिरने का क्रम और तीव्रगामी हो चला था l 

           इस रास्ते को पार करने के बाद हम लोग कुछ ही आगे बढ़े थे कि स्नोफॉल शुरू हो गई और वहां सूखे पहाड़ों, बहती नदी, और संकरे रास्ते के अलावा रुकने का कोई  स्थान नहीं था और भोजवासा अभी भी 3 किलोमीटर और दूर था। हम बिना विश्राम लिए थके हारे चलते जा रहे थे। थोड़ी ही देर बाद बर्फबारी रुक गई यह शायद हमारी यात्रा को और रोचक और यादगार बनाने के लिए थी l इस तरह हम लोग शाम 4:00 बजे भोजबासा पहुंच गएl अब तक पहाड़ों से धूप पूर्णतया जा चुकी थी और ठंड बढ़ती ही जा रही थी सूर्य की किरणों का प्रकीर्णन सिर्फ बर्फीली चोटियों पर ही  था l अब हमने भोजबासा में ठहरने का निश्चय किया क्योंकि गोमुख तक दिन रहते वापस भोजवासा लौटना किसी के लिए भी संभव नहीं था l

          भोजवासा में हम जहां रुके थे यह लाल बाबा का आश्रम थाl  आश्रम में उस दिन काफी यात्री रुके थे इनमें से अधिकांश यात्री सिर्फ पश्चिम बंगाल से आए थे बंगालियों की घुमक्कड़ प्रकृति के वारे में खूब सुना था आज देख भी रहे थे l सारे यात्री वहां मोबाइल का टावर ना होने के कारण अपने परिवार से बात करने के लिए चिंतित थे l कोई भी नेटवर्क ना होने के कारण वहां ऐसा लगा जैसे वाकई में यहाँ शांति है और सचमुच की असल शांति का अनुभव पहली बार हो रहा था l 

         ठंड वहाँ इतनी ज्यादा थी कि एक बार कमरे में घुसने के बाद बाहर निकलने की हिम्मत कर पाना तो किसी शूरवीर के बस की ही बात थी l चूँकि हमारा मकसद यहाँ तक आराम करने के लिए आना नहीं था इसका कई मायनों में महत्व था l मात्र जिज्ञासा के अतिरिक्त आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी य़ह महत्वपूर्ण था l संयोग से उस दिन नवरात्र की अष्टमी थी और हमारी हिंदू संस्कृति में इसका विशेष अर्थ होता है इसलिए मैंने पास ही गंगा किनारे जाकर थोड़ी देर ध्यान लगाने का निश्चय किया l मैंने ठंड से बचने के सारे उपाय किए और बाहर निकली भागीरथी की कल कल करती आवाज, विहंगम दृश्य, और उसके समीप बैठना किसी परम सौभाग्य से कम नहीं था, किसी तरह भागीरथी के किनारे पहुंचने के बाद यहाँ की असहनीय ठंड के आगे अनुकूलन करने में स्वयं को असमर्थ पाया l बस किनारे पहुंच कर थोड़ा सा जल हाथ में लिया पूरी श्रद्धा से मस्तक से लगाया और चारों ओर फैली सुंदरता को एक पल निहारा, ईश्वर को धन्यवाद दिया, और शीघ्रता से जाने में ही अपनी भलाई समझी।

          इतनी असहनीय ठंड से निपटने में कुछ ही दिनों पूर्व पढ़ी गयी पुस्तक संबल देने का काम कर रही थी पुस्तक प्रथ्वी के दक्षिणी ध्रुव अंटार्कटिका के वारे में थी - अंटार्कटिका एक रोचक और रोमांचक यात्रा जो एक वैज्ञानिक अरुण द्वारा स्वयं के अनुभव के आधार पर लिखी थी l पुस्तक में वहाँ की ठंड का जो वर्णन था उसके आगे यहाँ की ठंड से जूझने का हौसला मिल रहा था l वापस पलटते समय दूर ऊंचाई पर खड़े जीजाजी को बायनाकुलर और हैंडीकैम से चारों ओर के दृश्य का लुफ्त उठाते देखा वो इस कठोर वातावरण में भी काफी सहज थे उनके साथ पहले भी कई बार गंगोत्री से गोमुख, नंदनवन और तपोवन आने की यात्रा का अनुभव था l दीदी कमरे से बाहर नहीं निकली इतनी लंबी यात्रा की थकान, पैर की मांसपेशियों का  दर्द, घर की सुखद यादें और उसपर ये मौसम सर्द l मांसपेशियों के दर्द निवारण की तकनीक जो कुछ दिन पूर्व मैंने सीखी थी आज मुझे उसका प्रयोग करने और अपनी काबिलियत दिखाने का अवसर मिल रहा था किन्तु मैंने उनकी तकलीफ और बड़ा दी जब जल्दवाजी में मैंने बाम की जगह बैग में रखे सामान की किट में से किसी मेडीकेटेड टूथपेस्ट को निकाला और पैर में रगड़ दिया l 

        रात के खाने में आश्रम में फुल्का प्रसाद, दाल राम व सब्जी राम का आनंद लिया l  आश्रम के लोगों ने इसी नाम से सबको प्रेम से भोजन करवायाl रात में हम ने खिड़की से चंद्रमा की रोशनी से चांदी की तरह चमकते बर्फीले पहाड़ों का आनंद लिया l दिन में जहां ये चोटियां सोने की तरह दमक रही थीं तो अब ये चांदी में परिवर्तित हो चली थीं l

         सुबह जल्दी उठकर हम लोगों ने गोमुख की ओर प्रस्थान कियाl अब गोमुख हमसे सिर्फ 4 या 5 किलोमीटर दूर था और दूर से ही ग्लेशियर का ऊपरी भाग दिखाई दे रहा था हम लोग इसी ग्लेशियर की ओर उबड़ खाबड़ चट्टानों के बीच मार्ग तलाशते हुए चले जा रहे थे सुबह जल्दी पहुंच जाने के कारण हम लोग ग्लेशियर के एकदम निकट तक गए देर से आने वाले यात्री इतनी पास तक नहीं जा पाते क्योंकि धूप निकलने और तापमान बढ़ने के बाद ग्लेशियर से बड़ी-बड़ी चट्टानें स्वतः टूट कर गिरने लगती हैं और इतनी भयंकर आवाज आती है कि लोग डर जाते हैं। गंगा मां के उद्गम को इतना समीप पाकर मैं इतनी उत्साहित थी कि मुझे वहां के खतरे के बारे में ध्यान ही नहीं रहा इतने खराब रास्ते को मैं सबसे पहले इतनी जल्दी पार गयी मानो मेरे पैर में तो पंख लग गए।

        गंगा ग्लेशियर की गुफा से एक पतली धारा के रूप में निकलती है और इसका वेग बहुत ही तीव्र होता है मैं यहां तक आने के लिए और गंगा के मूल स्वरूप को प्रणाम करने के लिए बर्फ में पैर धंसाती हुई अंदर तक चली गई इस धारा के पहले काफी दूर तक स्नो बिछी हुई थी और उसके बाद ठोस बर्फ की मोटी चादर थी इसी चादर पर मैंने जैसे ही पैर रखे और थोड़ा सा गंगाजल हाथ में लेना चाहा वैसे ही बर्फ की चादर का एक बड़ा भाग टूट गया और मैं सीधे गंगा मां की गोद में संयोग से मेरे पीछे खड़े लोगों ने मुझे हाथ पकड़ कर खींच लिया और मैं बच गई यहां पर नीलकंठ का अनुभव काम आया है जो मैं अपने साथ अतिरिक्त जूते लेकर गई थी क्योंकि मेरे जूते मोजे पूरी तरह भीग गए थे और माईनस डिग्री तापमान में मेरे पैर एकदम शून्य हो चुके थे l दरअसल कुछ दिनों पूर्व विश्वविद्यालय से हमारे विभाग की ओर से सहपाठियों और शिक्षकों की टोली ने ऋषिकेश के आगे नीलकंठ की पदयात्रा की थी जिसमें नदी और पत्थरों के बीच चलने से मेरे नए ब्रांडेड जूते का सोल निकल गया और पूरे रास्ते मेरे सहपाठियों द्वारा जुटाए गए रस्सी, धागे को जूते में बाँध कर मैंने वो यात्रा की थी l उस यात्रा में अपनी क्षमता और उन जूतों का परीक्षण भी हो गया था जो शायद ट्रेकिंग के उद्देश्य से ही खरीदे थे l 

          खैर थोड़ा सामान्य होने के उपरांत, हम लोग ग्लेशियर के एकदम निकट मुश्किल से 5 मिनट और रुकेl ज्यादा रुकना खतरे से खाली नहीं था l थोड़ा दूर आकर हमने माँ गंगा की पूजा अर्चना की l हमारी इच्छा तपोवन तक जाने की थी लेकिन मार्ग बंद होने के कारण वहां जाना संभव नहीं था, इसलिए हम लोग दूरबीन से तपोवन के दर्शन करके और जीवन के इस दुर्लभ पल को मन में संजो कर वापस गंगोत्री की ओर रवाना हुए l वापसी की यात्रा उतनी मजेदार तो नहीं रही क्योंकि बर्फ में भीग जाने के कारण तेज बुखार के चलते पैरों में थोड़ी शिथिलता आ गयी थी और पहले की अपेक्षा कदम थोड़े डगमगाते हुए प्रतीत हुए l 

 जब हम गंगोत्री पहुंचे, तो रात्रि के लगभग 9:00 बजने को थेl होटल में गर्म पानी का प्रबंध था l वापसी के बाद हमें पुनः गंगोत्री धाम मंदिर के दर्शन भी करने थे, तो किसी तरह हाथ मुंह धो कर थोड़ा विश्राम के उपरांत हम पुल से नीचे उतर के मंदिर में आए l मंदिर में पुजारी समेत कुछ ही लोग थे जो अपने पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ पहाड़ी लोकगीत में कीर्तन कर रहे थेl गंगा की तीव्र लहरों की ध्वनि के साथ गीतों का तालमेल वातावरण को और दिव्य, मधुर व संगीतमय बना रहा थाl गीत के बोल तो याद नहीं पर आज भी उस गुंजायमान ध्वनि की स्मृति मन में कंपन, रोमांच और श्रद्धा उत्पन्न करती है l होटल वापस जाकर हमने सबसे पहले खाने का आर्डर किया l अब हमारा सारा ध्यान भूख पर ही केंद्रित थाl विज्ञान की छोटी कक्षाओं में पहाड़ों में देर से खाना पकने के बारे में पढ़ा था आज उससे वास्ता भी हो रहा था l दो-तीन घंटे बीतने के बाद भी... भोजन की प्रतीक्षा करते- करते लगा सब सो गएl एकदम शांत वातावरण में सिर्फ भागीरथी की कलकल करती आवाज सुनाई दे रही थीl तो सब घोड़े बेच के सो गए पर मेरे तो पेट में चूहे कूद रहे थेl मेरी आँखों से नींद ओझल थी किन्तु मैंने वो तीन घंटे कल कल करती भागीरथी की ध्वनि के साथ बिताए l आखिर 12:00 बजे के बाद होटल के कर्मचारी ने कमरे को नॉक किया तो जान में जान आई गरमा गरम आलू के पराठे और मटर आलू की सब्जी खाकर सोए तो सीधे सुबह आँख खुली और हमारे जाने का समय हो चला था, बस तैयार खड़ी थीl और हम इस कामना के साथ वापस चल दिए साक्षात गंगा मां के दर्शन का सौभाग्य हर एक भारतवासी को मिले और वह गंगा मां के प्रति कर्तव्यों के निर्वाह का संकल्प लें l

जय माँ गंगे 🙏🙏🙏

         


































शनिवार, 14 मार्च 2020

Corona vs Karuna

Corona vs. karuna 
कोरोना वायरस
तुम करुणा में बदल जाओ
जैविक हथियार की सोच से निर्मित
अनगिनत लोगों को मौत के घाट उतार
तुम जिस देश में आए हो
उस देश की मिट्टी
परिवर्तित कर दे तुम्हारी प्रक्रति l
पर कैसे कह दूँ
भय, आतंक, नफ़रत,
हिंसा की फैल रही विक्रति
तुम्हारा रास्ता रोक पायेंगी
पर असंख्य हौसलों और हिम्मत
से जूझती ये धरती 
सम्भवतः तुम्हें धर दबोच
तुम्हारा काम तमाम कर देगी
या जीवन की चाह रखने वाली
एक नयी सोच में परिवर्तित कर देगी ll

                                प्रतिभा कटियार 
   

शनिवार, 6 अप्रैल 2019

विरले

विरले ही होते हैं
जो यान बनाते हैं
बाकी तो तमाम
नहीं बना सकते
कागज की भी एक नाव
अभी से
बूढ़े हो गए हैं
उनके ख्यालात
टूटते दाँत और पकते बाल
की गणना में
घंटों वक्त बिताते हैं

विरले ही होते हैं
जो नाविक बन
समंदर की कश्त में
गश्त लगाते हैं
वाकी तो तमाम
तालाबों और नदियों
को पाटकर
दो मंजिला या तीन तल्ले का
घर बनबाते हैं
और दिखती नहीं गौरेया
बालकनी में बैठ कर
चिंता जताते हैं

विरले ही होते हैं
जो स्रजन में लगे
लोगों का हाथ बंटाते हैं
वाकी तो तमाम
योजनाओं को
कागज में समेट
पैसा डकार जाते हैं l
                  Pratibha Katiyar

सोमवार, 1 अप्रैल 2019

अभाव में पल रहे मेधावी बच्चों के लिए

प्यारे बच्चों,
देश की समृद्धि और खुशहाली
की तमाम संकल्पऩाओं के उपरान्त,
अवास्तविक सी लगती है
तुम्हारे संघर्षमय जीवन की कठिनाई l
किंतु सबसे अधिक वास्तविक है,
तुम्हारी निर्दोष व निश्छल मुस्कान l
जब तुम्हारे अथक प्रयास,
प्रत्येक बाधाओं से जूझते हुए
तुम्हें मंजिल तक ले जायेंगे,
तब फिर से तराशे जायेंगे
संघर्षमय जीवन के नए आयाम l
और तुम स्वयं,
जीवन का मापदंड हो जाओगे l
                          प्रतिभा कटियार

शुक्रवार, 15 मार्च 2019

Political tournament

Politics is here,
politics is there
Politics is everywhere.
Maya is here,
Mamta is there
Modi is everywhere.
Voter is here,
leader is there
They come near
to each other.
To make the country,
more better,
Political parties fight
for each other.
In a democracy,
the people are supposed to be their
own master.
Since more participants,
in democracy.
Political statements has gone
out of gear.
                      Pratibha Katiyar

शनिवार, 28 अप्रैल 2018

परिवेश

मेरे आस-पास का परिवेश
घर से दूर अनजान, वीरान
जंगल में जैसे कोई मचान।
शून्य में ताकती आँखे
कुछ  बूढ़े , ठूँठ जैसे बेजान।
खेतों  में  लहराती  फसलें
श्रम  में  ड़ूबे किसान।
छोटी-छोटी दुकानें
चाय समोसा घाटी
दिनभर बेचते, थक जाते
और शाम तक उधारी में
ग्राहक चट कर जाते।
काम की तलाश में
जुगत लगाते नौजवान।
आपस में बैठकर बतियाते ,
आंयेंगे अपने भी अच्छे दिन,
एक दुसरे को धीरज बंधाते।
स्कूल में चहचहाते बच्चे
दस का पहाड़ा
एक सांस में सुनाते।
स्थानीय मान को
चुटकी में हल कर जाते।
आंधी आने पर
बाग में आम बीनने जाते।
                                  Pratibha Katiyar

रविवार, 3 दिसंबर 2017

मनोवैज्ञानिक समस्याओं का निदान भौतिक विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में

मनोवैज्ञानिक समस्याओं का निदान भौतिक विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में 
प्रतिभा कटियार
Related imageआये दिन हममें से अधिकांश लोग प्रायः किसी न किसी अंतर्विरोध का सामना करते हैं तो मन अनायास ही उसके समाधान की ओर निकल जाता है।  गहराई में जाकर पता चलता है कि  समस्या के पीछे या तो कोई अकल्पनीय क्षण होता  होता है या फिर मानव  मन की परिकल्पना से उपजी संघर्ष की मनोदशा ऐसी परिस्थिति में दिखाई देता है हर ओर लोग अंतर्विरोध से जूझ रहे होते हैं।  आखिर क्या किया जाए इन अंतर्विरोधों का ऐसे अवसर पर आपको कोई ना कोई व्याख्यान  देते हुए दिख जाएगा। तर्क तथ्य प्रमाण दृष्टांत आदि का हवाला देकर मस्तिष्क को बांधकर हम अपनी हालत किसी प्राचीन दार्शनिक की भांति बना लेते हैं और प्रकृति के नियम को अपने सर को पूरा ब्रह्मांड समझ कर उसके अंदर ही खोजने का प्रयत्न करते हैं  कुछ हद तक हम समस्या पर काबू पा लेते हैं किंतु इससे अनिवार्य रूप से यह खतरा उत्पन्न होता है की विश्व का इस तरह से बनाया गया चित्र जो  हमारी परिकल्पना में होता है वास्तविक चित्र से  भिन्न ही होता हैl
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हल  प्रयोग से निकलना चाहिए 
तमाम तरह के मनोवैज्ञनिक  जड़त्वों  का सामना हमें करना पड़ता है और संघर्ष करते-करते समस्या के अंतिम समाधान की ओर जाने से पहले हमारी गति क्षीण हो जाती है। हमारी सोच नजरिया वक्तव्य श्रवण और दर्शन की क्षमता किसी संकीर्ण परिधि में बंध जाती है और हम चाह कर भी मंजिल की ओर नहीं पहुंच पाते मस्तिष्क में रासायनिक तत्वों का निर्माण शुरू हो जाता है और फिर टूट फूट मरम्मत का दौर शुरू हो जाता है ऐसे में लोग समस्याओं से घिरे हुए दिखाई देते हैं। भौतिकी के किसी भी सिद्धांत का सर्वोत्तम पारखी प्रयोग होता है। 
कैसे करें प्रकाश का प्रसरण 
Image result for man in standing sketch तमसो माँ ज्योतिर्गमय  अंधकार से प्रकाश की ओर गमन या अंधकार में ही प्रकाश का प्रसरण कैसे होना चाहिए ऐसे तर्कों से सीमित ना होकर प्रयोगों की ओर ध्यान देना चाहिए जो यह दिखाएंगे कि इन स्थितियों में प्रकाश का प्रसरण वास्तव में कैसा होता  है। ऐसा एक प्रयोग जो हमारे लिए सरल है क्योंकि हम स्वयं एक गतिमान पिंड पर रहते हैं। सूर्य की परिक्रमा में रत पृथ्वी किसी भी तरह सरल रेखा में गति नहीं करती और इसलिए किसी अन्य प्रयोगशाला के सापेक्ष स्थायी विरामावस्था में नहीं हो सकती। 
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इसलिए पृथ्वी पर प्रकाश के प्रसरण का अध्ययन करने का उद्देश्य रखते हुए हम वास्तव में प्रकाश के प्रसरण का अध्ययन एक गतिमान प्रयोगशाला में कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त हमारी परिस्थितियों में इस प्रयोगशाला का वेग अधिकतम है - 30 किमी प्रति सेकेण्ड। पृथ्वी का उसके अक्ष के गिर्द घूर्णन इस वेग में आधा किमी प्रति सेकेण्ड का अंतर उत्पन्न करता है जिसकी हम उपेक्षा कर सकते हैं। प्रश्न उठता है पृथ्वी पर खड़े किसी व्यक्ति की बराबरी क्या एक चलती रेलगाड़ी के साथ कर सकते हैं ?  
क्या हम ठहर गए हैं ? 
                               इस अंतर्विरोध के चलते हम अपनी खोज आगे नहीं बढ़ा पा रहे थे क्या हम ठहर गए हैं ? रेलगाड़ी सरल रेखा पर समरूप गति से चल रही थी और पृथ्वी वृत्ताकार पथ पर चल रही है फिर भी हम पृथ्वी की बराबरी रेलगाड़ी के साथ कर सकते हैं।
Image result for physics light velocity                       इन दोनों प्रेक्षकों को कोई दूर जाकर अध्यन करे तो उसे दिखाई देगा कि प्रकाश का आचरण पृथ्वी पर भी ठीक वैसा ही है जैसा रेलगाड़ी में। 

प्रकाश प्रसरित होता है समान वेग से 
                 सन 1881 में एक महान भौतिकविद माइकल्सन ने एक प्रयोग किया उन्होंने पृथ्वी के सापेक्ष प्रकाश के वेग को उसकी विभिन्न दिशाओं में पर्याप्त उच्च शुद्धता से नापा। वेगों के छोटे अंतर को पकड़ने के लिए उन्हें बहुत सूक्ष्म प्रायोगिक तकनीक का उपयोग करना पड़ा था।
                      प्रयोग की शुद्धता इतनी अधिक थी कि वेगों के अनुमानातीत सूक्ष्म अंतर को भी ज्ञात किया जा सकता था। माइकल्सन का प्रयोग उस समय से बिल्कुल भिन्न स्थितियों में दोहराया जाता रहा है जिससे सर्वथा अप्रत्याशित परिणाम सामने आये। पता चला कि गतिमान प्रयोगशाला में प्रकाश का प्रसरण वास्तव में बिल्कुल दूसरे ढंग से होता है वैसे नहीं जैसे हमने अपने तर्क में पहले सिद्ध किया था। माइकल्सन ने यह ज्ञात किया कि गतिमान पृथ्वी पर प्रकाश सभी दिशाओं में सर्वथा समान वेग से प्रसरित होता है।
प्रकाश की त्रासदी - प्रकाश तत्काल नहीं फैलता 
                   प्रकृति का एक महत्वपूर्ण नियम जिसे गति की सापेक्षिकता का सिद्धान्त कहा जाता है, सिद्धान्त है एक दूसरे के सापेक्ष सीधी और समरूप गति से चलने वाली सभी प्रयोगशालाओं में पिंड की गति समान नियमों का पालन करती है। प्रकाश भी सामान गति से पृथ्वी पर स्थापित सभी प्रेक्षकों पर फैलेगा किन्तु प्रकाश का प्रसरण तत्काल एक समान और क्षणिक नहीं होता हालाँकि उसका वेग बहुत विराट है तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकेण्ड।
Related image              ऐसे विराट वेग की कल्पना करना कठिन है क्योंकि हमारे जीवन में हमारा वास्ता इससे कम वेगों से ही पड़ता है। इसके फैलाव का वृहत वेग भी अनोखा है आश्चर्यजनक बात तो यह है कि इस वेग को कभी बदला नहीं जा सकता। जबकि पृथ्वी पर अन्य प्रेक्षकों की गतियों के वेग को घटाया या बढ़ाया जा सकता है चाहे वो चलती रेलगाड़ी हो या फिर बन्दूक से छोड़ी गयी गोली।
          उदाहरण के लिए यदि दागी गयी गोली के रास्ते में रेत की बोरी रखें बोरी को छेदकर गोली के वेग का अंश खो जायेगा तथा गोली पहले से धीरे चलेगी। प्रकाश की स्थिति बिल्कुल भिन्न है। प्रकाशीय किरणों के पथ में एक शीशे की प्लेट रखें। चूँकि शीशे में प्रकाश का वेग निर्वात की अपेक्षा कम होता है , इसलिए उसमें किरण पहले से धीरे चलेगी। यध्यपि शीशे से गुजरकर प्रकाश फिर तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकेण्ड का वेग प्राप्त कर लेगा। निर्वात में प्रकाश का प्रसरण अन्य सभी वेगों से भिन्न होता है। उसको कम या तेज नहीं किया जा सकता और यह उसका एक महत्वपूर्ण गुण है। प्रकाश की किरणें चाहे किसी प्रकार के पदार्थ से गुजरें ,पर निर्वात में आते ही उसका प्रसरण पूर्व वेग से होने लगता है।
मस्तिष्क को निर्वात में जाने से रोकें 
           कुछ ऐसी घटनाएँ, व् विश्वस्त प्रयोग हमें सापेक्षिकता सिद्धांत को सत्य मानने के लिए विवश करते हैं, यह सिद्धांत हमारी परिवेशी दुनिया के उन आश्चर्यजनक गुणों को प्रकाश में लाता है ,जो सतही अध्यन से प्रकट नहीं होते।
क्या हमने कभी सितारों की यात्रा के वारे में ध्यान दिया ,आकाश में सितारे हमसे इतनी दूर हैं कि इनमें से कुछ तक प्रकाश किरण को पहुँचने में 40 वर्ष लग जाते हैं। चूँकि हमें पूर्व ज्ञान है कि प्रकाश वेग से तेज यात्रा करना असंभव है ,हम अच्छी तरह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि सितारे तक 40 वर्ष से कम समय में पहुंचा नहीं जा सकता। यद्धपि यह निष्कर्ष गलत है क्योंकि हमने गति से सम्बंधित समय में परिवर्तन को ध्यान में नहीं रखा।
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यदि हम गति या वेग को बढ़ा दें तो उड़ान के समय को कम किया जा सकता है।
          सैद्धांतिक रूप से , काफी बड़े वेग से यात्रा करके हम एक मिनट में सितारे तक जाकर वापस पृथ्वी   पर आ सकते हैं पृथ्वी पर हालाँकि इसके दौरान कई वर्ष बीत जायेंगे। ऐसा लगता है कि इस प्रकार हमारे पास मानव को दीर्घायु करने का आधार हो गया , यद्पि केवल अन्य लोगों के दृष्टिकोण से ,चूँकि मानव उसके अपने समयानुसार वृद्ध होता जाता है। तथापि खेद है कि यदि सरसरी नज़र भी डालें तो यह सम्भावना अवास्तविक है। मानव शरीर दीर्घकालीन त्वरण की अवस्था के अनुकूल नहीं है ,जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के त्वरण से अधिक है। इसलिए प्रकाश के वेग के निकट गति को प्राप्त करने के लिए दीर्घकाल की आवश्यक्ता होती है।