शुक्रवार, 3 मार्च 2017

नारियल की चटनी

नारियल की चटनी 

याद है अक्षरशः ,
कहानी नारियल की चटनी की ,
छोटा सा प्रयास कविता में गढ़ने की
इसका स्वाद और भीनी सी सुगंध,
दिलायेगी खाने के जायके का आनँद
मुझे बहुत भाती है चटनी,
सैर कराती दक्षिण भारत की
जब खाने में आ जाती चटनी
अहसास दिलाती जैसे मैंने कर ली यात्रा ,
पूरे भारत भर की ।
                      प्रतिभा कटियार 

सोमवार, 23 जनवरी 2017

The Dilemma of Handloom industry

असमंजस के दौर में भारतीय हथकरघा उद्योग 


जब नए विकल्प तलाशे जा रहे हों तो क्यों ना हम एक नए नजरिये से देखें बात सिर्फ रेवेन्यू बढ़ाने की नहीँ है। बात है खादी वस्त्र और अन्य भारतीय उत्पादों के अंतर्राष्ट्रीय बाजार में साख बनाने की और जब इसकी तैयारी जोरों से चल रही हो एक ऐसे  समय पर, जब  खादी अपने सौ वर्ष पूरे कर अपनी शतक यात्रा करने के बाद पुनः  एक नए पड़ाव पर हो तब हमारी सोच और चर्चा का विषय इस बात को लेकर तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता कि चरखे के पीछे किसकी तस्वीर चस्पा होनी चाहिए गंगूबाई की ,गाँधी जी की या फिर मोदी जी की या फिर इस बात को लेकर भी कि चरखे के बहाने एक बार फिर गाँधी दर्शन पर विमर्श किया जाये  जो कि आजादी के बाद की पीढ़ी के लिए एक बहुचर्चित डिबेट या ग्रुप डिस्कशन का मुद्दा बन चुका है। 
       
  क्यों ना बार&aबार भ्रमित करने और नई पीढ़ी के लिए असमंजस फ़ैलाने वाले मुद्दों से बाहर निकलकर हम तथ्यात्मक और न्यायसंगत दृष्टिकोण अपनाएं और चरखे से सम्बंधित कुछ बातों को हम एक निर्विवाद सत्य के रूप में स्वीकार कर लें और वो यह कि चरखे के साथ हमारा जुड़ाव बहुत पुराना और लम्बा है। इसका अपना इतिहास होने के साथ चरखा आजादी का प्रतीक भी है जिसके बल पर गाँधी जी ने विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर देश को आत्मनिर्भर बनाने की बुनियाद खड़ी की। चरखे ने क्रांति ला दी और देखते ही देखते अंग्रेजी शासन की नींव उखड़ने लगी पूरे भारत में चरखा और गाँधी जन &जन की जागृति का प्रतीक बन गए। और इस प्रतीक के माध्यम से गुलाम भारत और स्वतन्त्र भारत के ऐतिहासिक संघर्ष की दास्तान भी सुनी जाने लगी। पर क्या स्वयं गाँधी जी इसे मात्र आजादी दिलाने तक ही सीमित मानते थे उनके विजन में तो कृषि और कुटीर उद्दोग के जरिये देश की अर्थव्यवस्था और समग्र विकास का ढांचा तैयार करने का सपना था।   
     क्यों ना हम बहसबाजी की बजाय क़ुछ नए विकल्प तलाशें और एक नई यात्रा के पड़ाव के प्रारम्भ में ठहरने की बजाय गति में और तीव्रता लायें। कुछ मामलों में हमें दक्षिण भारत से प्रेरणा लेनी चाहिए। दक्षिण भारतीय खाद्दय उत्पाद मसलन डोसा ,इडली ,उत्तपम ,सांवर  जो कि अंतराष्ट्रीय बाजार में अपनी पैठ बना चुके हैं। यहाँ से लेकर विदेश तक जगह -जगह साउथ इंडियन फ़ूड बाजार या रेस्टोरेंट अपनी एक अलग छवि का निर्माण कर चुके हैं। हालाँकि डोसा के साथ चरखा की समानता या तुलना करना काफी हास्यास्पद होगा पर क्या कभी हमने गौर किया है अपनी परम्पराओं की रक्षा को लेकर सजग दक्षिण भारतीय जो अधिकांशतः चावल या भात खाते समय हाथ की चारों उँगलियों सहित हथेली का प्रयोग करते हों क्या वो उस समय भी कभी खाने के साथ कांटे और चम्मच का प्रयोग करते होंगे। जब हमारे देश में इनका प्रचलन भी नहीं था या फिर उस समय जब हमने अंग्रेजों की देखादेखी उनकी नक़ल करना शुरू कर दिया। शायद तब भी नहीँ बल्कि देखा जाये तो वहाँ के लोग आज भी खाने की अपनी पारंपरिक शैली का प्रयोग करते हैं। आज भी वहां केले के पत्ते में रेसिपी परोस कर खाने का रिवाज है।
         अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उतरते समय फर्क सिर्फ सोच का था और सर्व करने का नया तरीका जिसमें जरा सा बदलाव किया गया और डोसे को केले के पत्ते की वजाय प्लेट में कांटे और चम्मच के साथ परोसा जाने लगा और डोसा बाहर निकलकर ना सिर्फ उत्तर भारत बल्कि अमेरिका] ब्राज़ील तक छा गया।  पर इस छोटे से बदलाव का किसी दक्षिण भारतीय ने विरोध नहीँ किया बल्कि उन्होंने शांत भाव से खाने का अपना पुराना पारंपरिक स्वरुप जारी रखा और आज डोसे के साथ दक्षिण भारतीय व्यंजन होने की पहचान बच्चे बच्चे की जुबान पर है। 
   
  देखा जाये तो डोसा सिर्फ एक उत्पाद है व्यक्ति नहीँ। चरखा भी एक उत्पाद है पर चरखा डोसे की तरह स्वतंत्र नहीँ। चरखे की डोर किस हाथ में है यह व्यक्ति &aव्यक्ति पर निर्भर है। सार यह है कि हथकरघा उद्द्योग कृषि क्षेत्र के बाद सर्वाधिक रोजगार देने वाला एक कुटीर उद्द्योग है। जोकि अपनी परंपरागत कलात्मकता के द्वारा ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सुदृणीकरण में महत्वपूर्ण योगदान करता है। कपास की खेती और पैदावार में  भारत को इसकी जन्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक नाबार्ड से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भारत में 38. 47 लाख हथकरघा बुनकर अपना जीविकोपार्जन हथकरघा बुनाई से कर रहे हैं। जिसमें 77 फीसदी महिलायें तथा 23 फीसदी पुरुष हैं। एक अनुमान के अनुसार वर्ष भर में देश के अंदर तथा विदेशों में हथकरघा उत्पादों की प्रदर्शनी में काफी आय अर्जित हो जाती है। साथ ही विदेशी मुद्रा का सृजन भी होता है। चाहे बनारसी साड़ी हो या कांजीवरम सिल्क लखनवी चिकन हो या संबलपुरी सूट हैंडलूम के इन उत्पादों ने भारत की विविधता और समृद्धि में चार चाँद लगाए हैं। 
                                                                                                                               प्रतिभा कटियार 



रविवार, 15 जनवरी 2017

चर्चा-ए-चरखा

चर्चा-ए-चरखा
इस बार चर्चा ए खास है ।चर्चा का विषय है चरखा । चरखा के साथ दो विभिन्न काल व विभिन्न परिवेश किंतु एक ही प्रान्त में जन्मे दो नायकों के बीच तुलना का । पटकथा जिसने भी लिखी हो पर किरदार दमदार है। पिछले कुछ दशकों से गाँधी जी के वारे में बड़ी अजीबो गरीब बातें कहने सुनने लिखने वालों ने भी इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है और पहली बार सचमुच ऐसा लगा है बापू को चरखे से प्रतिस्थापित करना किसी विस्थापन व त्रासदी के गहरे दर्द से गुजरने जैसा है।
      
           हालाँकि सरकार का मुख्य मकसद हथकरगा उध्योग को बढ़ावा देने का है । किंतु हथकरघा जनअभिव्यक्ति व जनमत का विषय बने उससे पूर्व देखा गया है इस तरह के प्रयोग देश में राजनीति का ही मंच तैयार कर रहे हैं । देश के सामाजिक आर्थिक विकास पर कोई बड़ा असर हो या ना हो पर इन घटनाओं को सतही ढंग से कवर करने में इलेक्ट्रानिक मीडिया के तमाम जनमाध्यम कोई कसर नहीँ छोडेंगे । 

        हाल ही में टीवी के एक वरिष्ठ व जाने माने पत्रकार ने हिन्दी अखबारों को लेकर एक टिप्पणी की जिसमें कहा गया क्या हिन्दी अखबार भी कचरा परोस रहे हैं । कुछ वर्ष पूर्व विकास पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत जाने माने वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ ने भी एक साक्षात्कार के दौरान प्रेस की हालिया पत्रकारिता को लेकर निराशा जनक स्थिति की तस्वीर पेश की थी। 

          चिंता वाजिब है और मन में सवाल भी उठ रहा है क्या अखबारों की भूमिका सिर्फ लोगों के बयानों को लेकर उनका विश्लेषण और मूल्यांकन करने तक सीमित रह गयी है। टेलीविजन पत्रकारिता हो या प्रेस पत्रकारिता भले ही दोनों के मंचों में गहरी असमानता हो और दोनों को बहुत ही अलग वातावरण में कार्य करना पड़ रहा हो । पर सच तो यह है पत्रकारिता को जहाँ लोग बेहद सरल नज़रिये से देखते थे आज वो पहले की तुलना में बहुत अधिक जटिल हुई है । इसके पीछे चाहे राजनीतिक बाहुबलियों का दवाब हो या बाज़ार का प्रभाव या तमाम अन्य कारण। 

narendra modi charkha के लिए चित्र परिणाम        किंतु आखिर पत्रकारिता का मुख्य मकसद सिर्फ जनान्दोलन खड़े करना ही नहीँ बल्कि लोगों के बीच स्थिरिता, साझेदारी, सदभाव व आम सहमति पैदा करना भी है ।बात जहाँ चरखे और गाँधी जी की है तो आमजनमानस के मन में चरखे के पीछे सदैव बापू का प्रतिबिम्ब ही दिखाई देगा । दोनों राष्ट्रीय प्रतीक होने के साथ राष्ट्रीय धरोहर भी है। चरखे के बिना गाँधी जी अधूरे हैं और गाँधी के बिना चरखा । खादी उध्योग फले फूले मोदी जी के इस नवीनतम प्रयोग ने इस सोच को एक नयी दिशा दी है । गाँधी जी और चरखा कल भी एक दूसरे के पर्याय थे और आज भी प्रासंगिक हैं । प्रयोग करते समय इस बात का ध्यान रखना होगा, नवीनता का सॄजन हो पर प्राचीनता का सरन्क्षण भी।
                                                                                                                                                                                प्रतिभा कटियार 

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016

सूचना बॉम्बार्डमेंट नहीं है जरुरी है सूचना स्रोतों का सही चयन और परस्पर तालमेल

सूचना बॉम्बार्डमेंट नहीं है जरुरी है सूचना स्रोतों का सही चयन और परस्पर तालमेल 


Let us finish the culture of paid news; otherwise it will finish us in coming days. 
                                                                                 p . Sainath                                   
सूचना के तमाम स्रोतों के बीच सन्देश कहीं छुप गया है और वो अपनी पहचान अहमियत व प्रासंगिता खो चुका है। कुछ लोगों का  मानना है सूचना बॉम्बार्डमेंट की तरह है। पर यह पूरी तरह सच नहीं आम तौर पर यह सोच उन लोगों की है जो सूचना के तमाम स्रोतों की विश्वसनीयता और गंभीरता को लेकर पशोपेश में हैं और अवांक्षित दवाव महसूस कर रहे हैं। सूचना के इन तमाम जनमाध्यमों खासकर सोशल मीडिया को सार्थक सन्देश देने की वजाय गप्पबाजी व अविश्वसनीय सूचनाओं का अम्बार मानते हैं। हालाँकि मीडिया कन्वर्जेन्स के दौर में ना सिर्फ यह पहचान कर पाना मुश्किल हो गया है कौन सा जनमाध्यम अधिक उपयुक्त है और किस पर अधिक निर्भर रहा जाये, साथ ही यह निश्चित कर पाना भी मुश्किल है कौन से सन्देश विशुद्ध रूप से किस मीडिया के कंटेंट ग्रुप से हैं। 

           यदि हम प्राचीन काल के पारंपरिक स्रोतों पर नजर डालें तो राजाओं के विशेष दूत द्वारा भेजे गए शाही फरमान से लेकर भित्तिचित्र व अशोक के शिलालेखों तक का अनोखा प्रयोग हर दौर में होता दिखाई देता है।और इनकी लोकप्रियता और संप्रेषणशीलता के प्रभाव को लोगों ने समय समय पर स्वीकार भी किया  है। पर पिछले कुछ वर्षों के आजादी के दौर से लेकर अब तक भारत में प्रिंट मीडिया के विकास, योगदान और भागीदारी  को नकारा नहीं जा सकता। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के तमाम दृश्य -श्रव्य उपकरणों और इधर नव मीडिया के आने के बाद भी इसकी प्रसार संख्या ,लोकप्रियता, उपयोगिता और विश्वसनीयता पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं है।

             हाल ही में जारी भारतीय प्रेस पंजीकरण की रिपोर्ट में प्रिंट प्रकाशन की पंजीकृत संख्या और सर्कुलेशन की बढ़ती रफ़्तार ने इस आशंका को  गलत साबित कर दिया कि दृश्य -श्रव्य व् डिजिटल माध्यमों के प्रसारण ने प्रिंट मीडिया को प्रभावित किया है। बल्कि प्रिंट मीडिया ने अपने आप को आधुनिक दृष्टिकोण के साथ  नए परिवर्तन और चुनौतियों का सामना करने में अधिक सक्षम बनाया है। अपनी कार्यप्रणाली में इसने सूचना प्रौद्दोगिकी को भी सम्मिलित किया है जिसके परिणामस्वरूप इसमें तेज गति और सस्ती कीमत के साथ बेहतर कवरेज प्रणाली भी विकसित हुई है। शिक्षा के प्रसार ने प्रिंट मीडिया के पाठकों की संख्या भी बड़ाई है। 


         अपनी तमाम विशेषताओं के चलते प्रिंट प्रकाशनों की एक अलग मौलिक पहचान है। यदि हम नियमित रूप से अख़बार पढ़ते हैं तो सूचना ना सिर्फ हमारे लिए आनंद की वस्तु है बल्कि  एक विशेष समय पर नियमित अध्ययन हमारी दिनचर्या और जीवन शैली को भी नियंत्रित करता है। जीवन प्रबंधन में अख़बार की भूमिका का अपना अलग योगदान है। ज्यादातर अच्छे और पाठकों के बीच गंभीर पहचान रखने वाले अख़बारों में कंटेंट से लेकर डिजाइन व लेआउट का निर्माण इस तरह किया जाता है कि पाठकों को संचार के सभी अवयवों की आवश्यक खुराक मिल जाती है। सूचना, शिक्षा, मनोरंजन के परस्पर तालमेल से ना सिर्फ पाठकों की जिज्ञासाओं का समुचित समाधान होता है बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, वित्त, पर्यावरण, खेलकूद, तकनीक व अनेक रोचक विषयों की जानकारी पाठकों का ज्ञानवर्धन भी करती है। 


       वास्तव में अख़बार और ज्यादा पढ़ने व जानने को प्रेरित करते हैं। प्रकाशित सामिग्री के प्रति विश्वसनीयता के चलते संदेशों की ग्रहण-शीलता भी अधिक है। हालाँकि व्यावसायिकता के चलते तमाम अख़बारों की गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ा है और इसने अपने स्वरुप में व्यापक फेरबदल किया है। इस पर औध्योगिक लामबंदी या किसी राजनीतिक पार्टी के प्रति विशेष झुकाव तथा पूरी तरह व्यावसायिक होने का आरोप भी लगता है।पेड न्यूज़ कल्चर ने पत्रकारिता की मूळ आत्मा को ही भारी क्षति पहुंचाई है जिसने एक अलग नकारात्मक वातावरण को जन्म दिया है।  फिर इसमें काम करने वाले पेशेवर, गैर पेशेवर और वो  तमाम लोग भी हैं जो अपने प्रोफेशन से संतुष्ट नहीं हैं और इसमें सुधार या बदलाव चाहते हैं।सकारात्मक और नकारात्मक जैसे आधुनिक  भारतीय दर्शन ने समाचारों और घटना की रिपोर्टिंग की तटस्थता को भी प्रभावित किया है। और अक्सर इन दोनों के संतुलन के बीच नकारात्मकता का पलड़ा भारी पड़ जाता है। 


          नकारात्मकता का दवाव हमें गहरे अवसाद में धकेल रहा है इसलिए एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण करना हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। जो लोग वैचारिक प्रदूषण मुक्त भारत का सपना देखते हैं उन्हें पहले स्वयं स्वकेंद्रित सोच से बाहर आकर सबके बीच बातचीत और परस्पर वार्तालाप व सीधा संवाद का निर्माण करना होगा। सारी नकारात्मकता का ठीकरा किसी एक पर उड़ेल कर सामाजिक उत्तरदायित्व बोध से किनारा नहीं किया जा सकता। अगर हम वास्तव में लोकतंत्र के सजग प्रहरी का निर्माण करना चाहते हैं तो सबसे पहले उन परिस्थितियों पर जरूर विचार करना चाहिए जिसमें कमजोर से लेकर दबंगों, गुप्तचरों, अवसरवादिता से घिरे लोगों और तमाम तरह की बाहरी व आन्तरिक नकारात्मक बातों को पनपने का अवसर मिलता है। 

       संचार के क्षेत्र में कार्य कर रहे लोगों को संवादहीनता या किसी वैचारिक निर्वात के दौर से गुजरने की पीड़ा को वो लोग नहीं समझ सकते जो इन तमाम विसंगतियों को भी व्यावसायिक दृष्टिकोण से नाप तौल कर अपना फायदा उठाने की फ़िराक में रहते हैं। पेशेवर लोगों को एक मजबूत इकाई बनकर एक दूसरे का मोरल सपोर्ट और नैराश्य भाव त्याग कर आशा का संचार करने पर भी ध्यान देना होगा। यदि आप संचार के क्षेत्र में कार्यरत हैं तो संवाद कायम करना होगा ना कि सम्राट किल्विष और शक्तिमान की भांति  अँधेरा करने और दीपक जलाने बुझाने की वकालत। 


                                                                      *****    प्रतिभा कटियार 

             

शनिवार, 17 सितंबर 2016

सतत विकास के साथ जरुरी है सतत खोज

सतत विकास के साथ जरुरी है सतत खोज 

 प्रसिद्ध तमिल कवि सुब्रह्मण्यम भारती की रचना की कुछ पंक्तियां हैं जिसका आशय है यदि एक भी आदमी के पास खाने को नहीं होगा तो हम इस दुनिया को नष्ट कर देंगे।
      हर भारतीय को देश की तरक़्क़ी का लाभ मिले इस प्रयास की खोज ने एक महत्वपूर्ण विकासात्मक सोच को 20 वीं सदी के उत्तरार्ध में जन्म दिया। और उसके बाद विकास के नाम पर अधिकांश अविकसित देशों ने विकसित देशों की नकल करना शुरु कर दिया।
     आधुनिक प्रौद्योगिकी ने विस्फोटक की तरह विकास काे और तीव्र कर दिया। इस बीच विकास के कई स्वरुप; अवधारणायें एवं मॉडल उभर कर आए और इससे यह सोच बनने लगी कि पूरी दुनिया के विकास की सोच में समरूपता हो समग्रता और एकता हो।
      पर अनगिनत विचारकों से बात करने और ज्ञान प्राप्त करने के बाद अचानक दाना मांझी जैसी घटना के बाद विकास की हर अवधारणा पर सबालिया निशान लग रहे हैं। और इस घटना ने एक बार फिर विकास के नये- नये मार्गों की खोज पर विवश कर दिया है। क्यों ना फिर से भूले बिसरे लोगों आदिवासी समाज और लुप्त जनजातियों के दरवाजों पर दस्तक देना आरंभ किया जाये।
दाना मांझी
दाना माझी पत्नी का शव लिए हुए अपनी  बेटी के साथ 
           सतत विकास के साथ सतत खोज की भी आवश्यकता है। हालांकि संचार माध्यमों के द्वारा दाना मांझी घटना के प्रसारण के बाद उनको ना सिर्फ सरकारी व निजी स्तर पर बल्कि बहरीन से आर्थिक मदद भी मिली है। चूंकि गरीबी के अंतर्राष्ट्रीय सरोकार भी हैं इसलिए अंतरराष्ट्रीय संवेदना दी है और इसकी सराहना भी होनी चाहिए। पर इस संबंध में सबसे अधिक निर्णायक कार्यवाही भारत को ही करनी चाहिए।
            हमें अपनी खोज और प्रयास देश की विलुप्त हो रही पारंपरिक ज्ञान संपदा प्रौद्योगिकी और उस सामाजिक परिवेश के संरक्षण की भी करनी होगी; जिस समाज में सदियों से लोग अपना भरण-पोषण करते आ रहे थे अचानक धीरे धीरे वहॉ की संपदा कैसे नष्ट होने लगी और इस तरह की घटनायें सामने आने लगी हैं।

दाना मांझी के लिए चित्र परिणाम
बहरीन के प्रधानमंत्री प्रिंस खलीफा बिन सलमान अल खलीफा 
     आधुनिक प्रोद्योगिकी और विकास की पश्चिमी सोच ने हमारे देश की पारंपरिक ज्ञान संपदा को भारी क्षति पहुंचाई है। और अब इसकी भरपाई के अलावा ना सिर्फ इसे संरक्षण देने बल्कि आर्थिक समाधान देने की भी आवश्यक्ता है। पर इसके लिए हम सबको राष्ट्रीय चेतना की संकुचित विचारधारा और अलगाववादी सोच से ऊपर उठकर एक राष्ट्र के रुप में संकल्प लेना होगा। और आपस में मिलकर समाधान की दिशा में कार्य करना होगा। जिन्हें देश के इतिहास भूगोल की थोड़ी बहुत भी बुनियादी जानकारी होगी ऐसे लोगों के माध्यम से स्कूल कॉलेज के छात्रों द्वारा आसपास के स्थानीय लोगों जनजातियों का पूरा विवरण एकत्र करवाया जा सकता है। सर्वेक्षणों के द्वारा बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त की जा सकती है और इन सब का एक दस्तावेज तैयार किया जा सकता है जिसके माध्यम से हमें वह सारी जानकारियां मिल सकती हैं जिसमें स्थानीय कलाओं; हुनरों कुशलताओं शिल्प कारीगरी आदि के बारे में आर्थिक संभावनाएं छिपी हैं। वास्तव में देश की समृद्धि का रास्ता बाहर से नहीं बल्कि अंदर ही मौजूद है बस उन सब स्रोतों को ढूंढ निकालने के लिए एक अभियान चलाने की व दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यक्ता है।
                                                                                                                                                                 *******   प्रतिभा कटियार।

मंगलवार, 2 अगस्त 2016

आत्मविश्वास

rising sun के लिए चित्र परिणामहे सूर्य देव
तुम्हारे होते हुए मैं क्यूँ जलूँ
माना कि रात्रि अंधेरी
पर दिन निकलेगा
सूर्य उगेगा छितिज से आसमान का
आरोहण होगा
एक नया स्वप्न जगेगा
इतनी वैज्ञानिक जागरुकता के बावजूद
मैं क्यों जलूॅ
नहीं इतनी प्रबल महत्वाकांक्षा
बनूं इस ब्रह्माण्ड का एक सितारा
जो रहता सुदूर हमसे लाखों प्रकाश-वर्ष 
महज टिमटिमाता गहन रात्रि
देखो मेरी पृथ्वी पर
रहते हजारों प्रजाति के
नाना जीव-जन्तु और मनुष्य
इनके संग क्यों ना
संवाद स्थापित करूं
क्यों अंधकार को कोसूॅ
प्रलय की आॅधियों से लडूॅ
सफलता के मापदंड और पैमाने
की रूपरेखा गढूं
दूसराें के बताये हुए रास्ते पर
कदम दर कदम चलूं
जो हैं महज लकीर के फकीर
अपनी ही कुत्सित योजनाओं
मान्यताओं के आराजक
लोभी उपासक
इससे अच्छा है
स्वम् को गढ़ॅू
उस पथ पर चलूॅ
जहाॅ जाते हों अनेकों सत्पुरुष
दिखाते राह
बनाते सुगम सरल जीवन का पथ
जटिलताओं में नहीं उलझाते
और ना रचते चक्रव्यूह
करते आशाओं का दीपदान
देते ज्ञान और विश्वास की संपदा
जो बनाते मजबूत प्रकाश स्तंभ।
                          *********  प्रतिभा कटियार।

रविवार, 31 जुलाई 2016

क्या हम सचमुच सतत विकास में पिछड़े हैं।







क्या हम सचमुच सतत विकास में पिछड़े हैं।

आंकड़े चौंकाने वाले भले ही ना हो पर हमें सोचने पर विवश करते हैं सतत विकास सूचकांक में भारत 149 देशों में 110वें स्थान पर है। जीडीपी के मामले में हम दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था हैं पर मानव संसाधन विकास में हम अपने कुछ पड़ोसी देशों से भी पिछड़े हैं सीधा सा कारण है हमारा देश दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी का भरण पोषण करता है विकास के आज के वक्त के सबसे प्रचलित लोकप्रिय मॉडल सतत विकास को लेकर की जा रही अवधारणा कोई नई नही है। प्राचीन काल से ही हमारा देश भोगवादी प्रवृत्ति से परे सम्यक अवधारणा व उपभोग के बजाय समुचित उपयोग पर बल देता रहा। सतत विकास को लेकर किये जा रहे आकलन के पीछे मूलभूत अंतर जो दिखाई देता है वह यह है कि हमारा सारा नियोजन ज्ञान को हासिल करने में लगा रहा और अन्य देशों ने नये नये बाजार निर्मित करने में अपना जोर लगाया। बाजार का निर्माण करने में हम भले ही पीछे रहे हों पर आज हमारा देश एक बड़े बाजार के रूप में सबको खूब लुभा रहा है। आज भी विरासत से मिले ज्ञान की कुछ पारंपरिक बातें हमारे समाज की प्रचलित अवधारणाओं में हैं। यह इतनी सुदृढ़ और व्यवस्थित हैं कि इन पर कोई अतिरिक्त संगठन खड़ा करने की जरूरत नहीं है। पर क्या कारण है कि ना सिर्फ नये मॉडल गढ़ने की हवा को बल मिल रहा है बल्कि नये ढ़ॉचे निर्मित भी हो रहे हैं। नये संगठन खड़े हो रहे हैं कहीं ना कहीं हमने इस बात को भुला दिया है विरासत में मिले पारंपरिक ज्ञान को हमने रूढ़िवादी मानसिकता से देखना शुरू कर दिया है।  और अब हमारी हर कोशिश उस ज्ञान को ठोकपीट कर बाजार के काबिल बनाने की है। भले ही यह नये विकसित मॉडल हमारी समृद्दि में विशेष योगदान ना दें पर भविष्य में इन मॉडलों के ध्वस्त अवशेष एेतिहासिक समृद्दि की गवाही तो देंगे ही।
                                                                                                                                                                  **********      प्रतिभा कटियार